Friday, November 19, 2010

कागज से कौन सा रिश्ता....



यूँ अकेला मैं ,अनजान सा ,कलम लिए ,तेरे चेहरे की लकीरें हूँ खींचता ,
जब लकीरों ने मेरे हाथ की है दुश्मनी निभाई ,तो कागज से कौन सा रिश्ता ,


शशि ' दिल से.....

क्यों हंसी वो

क्यों हंसी वो याद आती है हर पहर ....

जब निशानी उसकी इन हांथो से भी मिटा बैठे है हम ....


शशि 'दिल से .....

ये रात बड़ी रंगीन होती है..........


ये रात बड़ी रंगीन होती है ,क्यूँ लोग ये कहते है ,

पर हमने जब देखा ,बिन तेरे ,अँधेरे में कुछ चमकते तारे ही दीखते है ,

हो सकता है तुम नहीं हो ,तो हर रंग ,बेरंग सा हो लग रहा ,

वरना आँखों से बहते अंशू में भी हर रंग जहाँ के बहते है .